Sunday, 22 May 2016

लघुपथन, अतिभारण एवं फ्यूज -

हम अपने घरों में विद्युत शक्ति की आपूर्ति मुख्य तारों (जिसे मेंस भी कहते हैं) से प्राप्त करते हैं। ये मुख्य तार या तो धरती पर लगे विद्युत खंभों के सहारे अथवा भूमिगत केबलों से हमारे घरों तक आते हैं। हमारे घरों में आने वाली विद्युत आपूर्ति में तीन प्रकार के तार प्रयुक्त किए जाते हैं-
 

1. विद्युन्मय तार या फेज (Phase)

2. उदासीन या न्यूट्रल (Neutral) तार

3. भूसंपर्कन (Earthing) तार

जब कभी घर की बिजली को ठीक कराने के लिए किसी मेकेनिक को बुलाते हैं। तब मेकेनिक उस समय एक टेस्टर लगाकर विद्युत की सप्लाई की जाँच करता है। घर के सॉकेट में तीन छेद होते हैं। सॉकेट के जिस सिरे में टेस्टर लगाने पर टेस्टर में चमक उत्पन्न होती है, उसे विद्युन्मय तार या फेज (Phase) कहते हैं। घरेलू विद्युत परिपथ में फेज में सामान्यतः लाल रंग का प्लास्टिक चढ़ा हुआ तार प्रयुक्त किया जाता है। सॉकेट के फेज सिरे के पास स्थित जिस सिरे में टेस्टर लगाने पर टेस्टर में चमक उत्पन्न नहीं होती है, उसे उदासीन या न्यूट्रल (Neutral) सिरा कहते हैं। न्यूट्रल तार पर वोल्टेज का मान शून्य होता है। न्यूट्रल तार के रूप में सामान्यतः काले रंग का प्लास्टिक चढ़ा हुआ तार प्रयुक्त किया जाता है। इन दोनों तारों के बीच 220 वोल्ट की विद्युत आती है। तीसरा तार भूसंपर्कन (Earthing) तार होता है, जिस पर हरे रंग का प्लास्टिक चढ़ा हुआ होता है। भूसंपर्कन तार भूमि में गहराई पर दबी तांबे की प्लेट से संयोजित होता है। भूसंपर्कन एक सुरक्षा उपाय है जो यह सुनिश्चित करता है कि बिजली के किसी उपकरण के धात्विक आवरण से अगर फेज का तार छू रहा हो तो उस उपकरण का उपयोग करने वाले व्यक्ति को गंभीर झटका लगे।

घर में लगे मीटर बोर्ड में ये विद्युन्मय तार तथा उदासीन तार मुख्य फ्यूज से होते हुए एक विद्युत मीटर में प्रवेश करते हैं। इन्हें मुख्य स्विच से होते हुए घर के लाइन तारों से संयोजित किया जाता है।

ये तार घर के पृथक-पृथक परिपथों में विद्युत आपूर्ति करते हैं। प्रायः घरों में दो पृथक परिपथ होते हैं, एक 15 एम्पीयर विद्युत धारा अनुमतांक के लिए जिसका उपयोग उच्च शक्ति वाले विद्युत साधित्रों जैसे गीजर, वायु शीतित्र / कूलर (air cooler) आदि के लिए किया जाता है। दूसरा विद्युत परिपथ 5 एम्पीयर विद्युत धारा अनुमतांक के लिए होता है जिससे बल्ब पंखे आदि चलाए जाते हैं।

 लघुपथन (Short Circuit)-

जब किसी कारण से फेज न्यूट्रल आपस में सीधे ही जुड़ जाए तो इसे परिपथ का लघुपथन कहते हैं। लघुपथन होने पर परिपथ में अत्यधिक विद्युत धारा बहती है जिससे घर के उपकरण गर्म होकर आग पकड़ सकते हैं और जल सकते हैं।

लघुपथन के कारण-

1. जब परिपथ में विद्युत धारा का मान सुरक्षा सीमा से अधिक होता है तो तार गर्म हो जाते हैं जिससे उन पर चढ़ा प्लास्टिक का आवरण पिघल जाता है तथा फेज न्यूट्रल आपस में सीधे ही जुड़ जाते है और लघुपथन हो जाता है।

2. इसके अलावा जब तार बहुत पुराने होने के कारण उन पर चढ़ा प्लास्टिक का आवरण कमजोर होकर टूट जाने से भी लघुपथन हो जाता है।

लघुपथन से हानि -

लघुपथन होने पर परिपथ में अत्यधिक विद्युत धारा बहती है जिससे घर के उपकरण गर्म होकर आग से जल सकते हैं तथा घर में अग्नि दुर्घटना हो सकती है।

अतः दुर्घटना से बचने के लिये या विद्युत उपकरण को नष्ट होने से बचाने के लिए हम फ्यूज का प्रयोग करते हैं।

अतिभारण (Overloading)-

परिपथ में अत्यधिक धारा प्रवाहित होने का एक अन्य कारण एक ही सॉकेट से कई युक्तियों को संयोजित करना हो सकता है। इसे परिपथ में अतिभारण (Overloading) होना कहते हैं। अतः हमें एक ही सॉकेट से कई युक्तियों को नहीं लगाना चाहिए।

फ्यूज -

फ्यूज कम गलनांक वाली धातु का एक ऐसा छोटा-सा टुकड़ा होता है जिसे परिपथ के श्रेणीक्रम में लगाया जाता है तथा जो परिपथ में सुरक्षा सीमा से अधिक धारा प्रवाहित होने पर पिघल जाता है जिससे परिपथ टूट जाता है और परिपथ में धारा प्रवाह बंद हो जाता है। इस प्रकार यह परिपथ को जलने से बचाता है।
 

फ्यूज ऐसी धातु से बनाया जाता है जिसका गलनांक कम हो, चालकता अधिक हो तथा जो ऑक्सीकरण से क्षतिग्रस्त नहीं हो, जैसे - चांदी, तांबा आदि।

फ्यूज को उस परिपथ के श्रेणीक्रम में लगाया जाता है जिसकी सुरक्षा की जानी होती है। सामान्य कार्य परिस्थितियों में फ्यूज का तत्व (एलीमेंन्ट) इसके गलनांक से कम ताप पर रहता है। अर्थात सामान्य धारा (Normal Current) प्रवाहित होने पर यह बिना तप्त हुए गलनांक से कम ताप पर रहता है। जबकि लघुपथन होने अथवा अन्य कारण से अतिभारण हो जाता है तो फ्यूज में से प्रवाहित होने वाली धारा का मान सुरक्षा सीमा से बढ़ जाता है। इससे फ्यूज का ताप बढ़ जाता है और फ्यूज का तत्व (एलीमेंन्ट) पिघल जाता है अर्थात फ्यूज उड़ जाता है और इससे आगे जुड़े परिपथ में धारा प्रवाह रुक जाने से वह सुरक्षित रहता है। इस प्रकार फ्यूज मशीनों और उपकरणों को अत्यधिक धारा प्रवाह के कारण क्षतिग्रस्त होने से बचाता है।

फ्यूज के लिए कौनसी धातु उपयुक्त-

फ्यूज की क्रिया इस बात पर आधारित है कि यह सामान्य विद्युत धारा पर बिना गर्म हुए प्रवाहित होने दें किंतु जब धारा का मान सामान्य मान से बढ़ जाए तो यह तेजी के साथ गलनांक ताप तक गर्म होकर पिघल जाए तथा परिपथ टूट जाए। इस क्रिया को करने के लिए फ्यूज-तत्व के रूप में ऐसी धातु काम में ली जाए जिसमें निम्नांकित वांछित विशेषताएं हो-

1. कम गलनांक जैसे- टिन, सीसा।

2. उच्च चालकता जैसे- चांदी, तांबा।

3. ऑक्सीकरण की क्षति से मुक्त हो जैसे- चांदी।

4. कम कीमत जैसे- टिन, सीसा, तांबा।

इस प्रकार हम देखते हैं कि किसी भी एक धातु में उक्त सभी विशेषताएं नहीं होती है। जैसे टिन का गलनांक तो न्यून होता है किंतु इसका विशिष्ठ प्रतिरोध अधिक होता है (चालकता कम है) और यह ऑक्सीकरण से क्षतिग्रस्त हो जाती है। इसी प्रकार तांबे की चालकता अधिक है किंतु यह ऑक्सीकरण से क्षतिग्रस्त हो जाता है। अतः फ्यूज बनाने में किसी किसी प्रकार से समझौता करना करना पड़ता है।

फ्यूज बनाने के लिए टिन, सीसा, जस्ता, तांबा एवं चांदी को प्रयुक्त करते हैं। 10 ऐम्पीयर की कम विद्युत धारा के लिए टिन अथवा टिन और सीसा की मिश्रधातु (सीसा 37 प्रतिशत और टिन 63 प्रतिशत) को फ्यूज के लिए प्रयुक्त किया जाता है। उच्च धारा के लिए तांबा अथवा चांदी को काम में लिया जाता है। तांबे को ऑक्सीकरण से बचाने के लिए तांबे पर टिन की परत चढ़ा कर प्रयुक्त करने की परम्परा है।

वर्तमान में उच्च कीमत के बावजूद चांदी के फ्यूज प्रयुक्त किए जा रहे हैं क्योंकि-

- यह ऑक्सीकरण से मुक्त होती है।

- शुष्क वायु में क्षतिग्रस्त नहीं होती है।

- इसका प्रसार गुणांक अति न्यून होता है।

- इसकी चालकता बहुत अधिक होती है जिससे निश्चित रेटिंग के फ्यूज के लिए अन्य पदार्थ की तुलना में चांदी की बहुत कम मात्रा की आवश्यकता होती है तथा

- कम विशिष्ठ ऊष्मा के कारण यह पिघलते ही जल्दी वाष्पित हो जाती है।

महत्वपूर्ण तथ्य -

फ्यूज के पदार्थ की Current Rating -

यह धारा का वह सामान्य मान है जिस पर फ्यूज बिना अधिक गर्म हुए या पिघले रहता है।

फ्यूजिंग धारा-

यह धारा का वह अधिकतम मान है जिस पर फ्यूज अत्यधिक गर्म होकर पिघल जाता है।

फ्यूजिंग धारा और फ्यूज के व्यास में संबंध-

                      I = k d3/2

जहां I फ्यूजिंग धारा और d फ्यूज तार का व्यास है।
k को फ्यूज नियतांक कहते हैं। फ्यूज नियतांक का मान उस धातु पर निर्भर करता है जिससे इसे बनाया जाता है।